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मंगलवार, 19 मई 2009

परोपकार

मनीषियों के विचार से-

'धन गया, तो कुछ नहीं गया,

स्वास्थ्य गया, तो कुछ गया, और

चरित्र गया, तो सबकुछ गया'-

दूसरे शब्दों में ,

चरित्र एक बेशकीमती धन है,

आला रतन है।

सोचता हूँ,

ऐसे कीमती रतन को

आज के ज़माने में

अपने पास रखना -

खतरे से खाली नहीं।

इसलिए-

मैंने फ़ैसला किया है कि

इस झंझट में ही न पडूं-

और इसे दूसरो के लिए छोड़ दूँ ;

अपनी संचयिका मनोवृति को

कुछ परोपकार की ओर मोड़ दूँ?

गुरुवार, 14 मई 2009

ज़िन्दगी:नए प्रतिमान

जिंदगी,
एक शंख है
जिसे मुंह भर फुत्कारो-
तो बोलता है,
अधरों पर डोलता है
बाकी तो वह पोल है
जितना पीटो उतना बोले,
ऐसा ढोल है।
भई, दुनिया गोल है।
**
ज़िन्दगी
एक छाता है,
जिसे सर पर उठा रखो
तो, छाया दे,
अशरीरी काया दे;
बाकी तो वह कुकुरमुत्ता है-
जो सूरत से अच्छा है,
पर धागे सा कच्चा है।
**
ज़िन्दगी
एक ईंट है
जिसे कारीगरी अंगुलियाँ उठा लें,
तो मीनारें झूम उठें,
अम्बर को चूम उठें,
बाकी तो वह मिटटी है
जो लातों से कींची गई

हाथों से भींची गई-
और, कर दी गई
अग्नि की लपटों में कैद-
अन्तिम संस्कार के लिए।
**
पर दरअसल-
जिंदगी न तो शंख है,
न छाता है,
और न ही ईंट है।
वरन
एक ऐसी अंतहीन कहानी है
जिसमें चिडिया-
फुर्र करके उड़ती रहती है-
एक......दो.......तीन...
और अनंत।