गुरुवार, 14 मई 2009

ज़िन्दगी:नए प्रतिमान

जिंदगी,
एक शंख है
जिसे मुंह भर फुत्कारो-
तो बोलता है,
अधरों पर डोलता है
बाकी तो वह पोल है
जितना पीटो उतना बोले,
ऐसा ढोल है।
भई, दुनिया गोल है।
**
ज़िन्दगी
एक छाता है,
जिसे सर पर उठा रखो
तो, छाया दे,
अशरीरी काया दे;
बाकी तो वह कुकुरमुत्ता है-
जो सूरत से अच्छा है,
पर धागे सा कच्चा है।
**
ज़िन्दगी
एक ईंट है
जिसे कारीगरी अंगुलियाँ उठा लें,
तो मीनारें झूम उठें,
अम्बर को चूम उठें,
बाकी तो वह मिटटी है
जो लातों से कींची गई

हाथों से भींची गई-
और, कर दी गई
अग्नि की लपटों में कैद-
अन्तिम संस्कार के लिए।
**
पर दरअसल-
जिंदगी न तो शंख है,
न छाता है,
और न ही ईंट है।
वरन
एक ऐसी अंतहीन कहानी है
जिसमें चिडिया-
फुर्र करके उड़ती रहती है-
एक......दो.......तीन...
और अनंत।

6 टिप्‍पणियां:

  1. जिसमें चिडिया-
    फुर्र करके उड़ती रहती है-
    एक......दो.......तीन...
    और अनंत।
    Yahi sachchaii hai.
    Wah,
    aapke BLOG tak laane ke liye Vandanaa ji ka aabhar.

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  2. dhanyvaad kumarendr ji. vandana meri beti hai.aap ko yahan lane ke liye mai bhi aabhari hoon. aapka bahut-bahut dhanyvad.

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  3. कवितायें बहुत पसंद आईं !
    हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है |
    कविताओं के अलावा संस्मरण और जीवनानुभव भी लिखें तो अच्छा रहेगा |

    टिप्पणी प्रक्रिया से कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें, टिप्पकों को ज्यादा सुविधा रहेगी |

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  4. धन्यवाद अर्कजेश जी.आपकी सलाहों पर ज़रूर अमल करूंगा.

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  5. सुंदर कविताएं..जीवन की शंख से तुलना नवीन और सार्थक लगी..

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